गी-ल            विनोद श्रीवास्तव

खुशबू ने कहा

कौन मुस्काया

शरद के चांद-सा
सिंधु जैसा मन हमारा हो गया

एक ही छवि
तैरनी है झील में
रूप के मेले न कुछ कर पाएंगे
एक ही लय गूंजनी संसार में
दूसरे सुर-ताल किसको भाएंगे

कौन लहराया
महकती याद-सा
फूल जैसा तन हमारा हो गया

खिल गया आकाश
खुशबू ने कहा-
दूर अब अवसाद का घेरा हुआ
जो कभी भी
पास तक आती न थी
उस समर्पित शाम ने जी भर हुआ

कौन गहराया
सलोनी रात-सा
रागमय जीवन हमारा हो गया

पूर्व से आती हवा फिर छू गई
फिर कमलमुख हो गई संवेदना
जल तरंगों में नहाती चांदनी
हो गई है इन्द्रधनुषी चेतना

कौन शरमाया
सुनहरे गीत-सा
धूप जैसा क्षण हमारा हो गया


फिर हमारे ताल में

फिर हमारे ताल में
कोई कमल उभरे खिले

पंक में होती नहीं
यदि सूर्यमुख संभावना
किस तरह से जन्म लेती
रूप की अवधारणा

फिर कमल की नाल में
झलकें सलोने सिलसिले

रूप की बारादरी में
गंध की वीणा बजे
स्नान कर मधुपर्व में
नीलाम्बरा उत्सव रचे

फिर सुनहरे थाल में
झिलमिल किरन कुंकुम मिले

उत्सवों में भी महोत्सव-
का नयन में घूमना
एक ही पल को सही
अनुराग का नभ चूमना

समर्पित भू-चाल में
महके स्वरों की छवि हिले.

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