गी-ल            शिवबहादुर सिंह भदौरिया

टेढ़ी चाल जमाने की

सीधी-
सादी पगडण्डी पर
टेढ़ी चाल जमाने की

एक हकीकत मेरे आगे
जिसकी शक्ल कसाई सी
एक हकीकत पीछे भी है
'ब्रूटस' की परछांई सी

ऐसे में भी
बड़ी तबीयत
मीठे सुर में गाने की

जिस पर चढता जाता हूं मैं
है पेड़ एक थर्राहट का
हांथों तक आ पहुंचा सब कुछ
भीतर की गरमाहट का

जितना खतरा
उतनी खुशबू
अपने सही ठिकाने की.


फिर आसार दिखे पानी के


पूरब दिशा
कन्त कजरायी
फिर आसार दिखे पानी के

पूरा जिस्म तपन का टूटा
झुर झुर झुर ढुरकी पुरवइया
उपजी सोंधी गन्ध, धूल में
पंख फुला लौटी गौरइया

सूखे ताल
दरारों झांके
लम्बे हाथ दिखे दानी के

कानों से प्राणों में पहुंची
टेर भरी तापस पगध्वनियां
घर के बिजली के पंखे भी
चक्रावर्तित मन की दुनियां

कौंधे
अर्थाभास अचीन्हें
फिर श्रंगार दिखे वाणी के.

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