गी-ल         शीलेन्द्र सिंह चौहान

आग उगलती सदी मिली

वृक्ष मिले
अपने फल खाते
पानी पीती नदी मिली
जाने क्या हो गया समय को
आग उगलती सदी मिली

सूरज और चांद के घर में
बारूदों के ढेर मिले
कागज की तलवार हाथ में
लिये काठ के शेर मिले
सरकन्डों की राजसभा में
झुकी छांव बरगदी मिली

राम भरोसे मिली व्यवस्था
पत्थर मिले दूध पीते
अजगर सोते मिले महल में
केहरि टुकड़ों पर जीते
कुटिया की खोटी किस्मत को
पग-पग पर त्रासदी मिली

शीश कटी देहों के आगे
भाषण देते लोग मिले
धनवन्तरि की काया में भी
लगे भयानक रोग मिले
इतना हुआ बेरहम मौसम
नेकी मांगी बदी मिली.


ओ मेरे घनश्याम

लिखा समय ने सारा मधुवन
लकड़कटों के नाम
कब आवोगे शंख बजाने
ओ मेरे घनश्याम

बहरी रैन, हुये दिन गूंगे
धूप समेटे पंख
पानी-पानी चीख रहे हैं
पड़े रेत पर शंख
पान, फूल, पत्तों पर पसरी
सन्नाटे की शाम

काली झील, बदलता मौसम
आसमान बदरंग
हंसों के भी बदल गये हैं
रहन सहन के ढंग
चितकबरी चीलों के डैने
बांट रहे कोहराम

बुलबुल, मैना, कोयल भूली
अपनी मीठी तान
''हुआ-हुआ'' के बोल बेसुरे
खाये जाते कान
सूरज मांग रहा धरती से
उजियारे के दाम.


सम्पर्क-
दादूपुर बंथरा
लखनऊ (उ.प्र.)