गी-ल                   शांति सुमन 

ओस भरी दूबों पर

हनी को चिन्ता है जड़ की
जड़ को फूलों की
इसी तरह से गुजर-बसर चलता है मौसम में

आएगी चिड़िया पहले
पत्तों से बतियाएगी
धूप-हवा का हाल-चाल
ले धीरे उड़ जाएगी
ओस भरी दूबों पर सरकी
छाया धूपों की
यही प्यार नहलाता सबको खुशी और गम में

शनिगांधार बजाती लहरी
हरियाती लतरें
उजली-नील धार में लिखती
मन की कोमल सतरें
नहीं सूखती नदी आज भी
गांव सिवाने की
फसलों के सुर में बजती हैं तानें सरगम में

सड़क -किनारे हाथ उठाये
घर की नई कतारें
खिड़की-दरवाजे से होकर
पहुंची जहां बहारें
मैली होकर भी उजली हैं
आंखें सिलहारिन की
अपने भीतर कई हाथ उगते जिनके श्रम में

अनहद सुख

ह जो चमक रहा है दिन में
अपना ही घर है

छत के ऊपर कटी पतंगें
दौड़ रहे हैं बच्चे
सूखे कपड़ों को विलगाकर
खेल रहे हैं कंचे

यह जो बेच रहा है टिन में
गुड़ औ शक्कर है

एक-एक रोटी का टुकड़ा
एक-एक मग पानी
फिर भी रोती नहीं सवीता
नानी की हैरानी

यह जो सोच रहा है मन में
असली फक्कड़ है

नंगे पांव चले बतियाने
इस टोले, उस टोले
कीचड़ को ही बना आइना
उझक-उझक डोले

यह अनहद सुख जागा जिनमें
वह तो इश्वर है

सम्पर्क-
द्वारा- श्री अरविन्द
३६, आफीसर्स फ्लैट, जुबली रोड
नार्दन टाउन, जमशेदपुर