गी-ल                     राम सेंगर

रहते तो मर जाते

ताराचन्द, लोकमन, सुखई

गांव छोड़कर चले गये

गांव, गांव-सा रहा न भैया
रहते तो मर जाते

धंधे-टल्ले बन्द हो गये
दस्तकार के हाथ कटे
लुहरभटि्‌ठयां फूट गयीं सब
बिना काम हौसले लटे

बढई, कोरी, धींवरटोले
टोले  महज कहाते

हब्बी, फत्ते और ईसुरी
जात-पांत की भेंट चढ़े
भाग गया सुलतान हाथरस
पापड़  बेले बड़े-बड़े

रिक्शा खींच रहा मुंहबांधे
छिपता नहीं छिपाते

तेलीबाड़ा, राजबाड़ा था
मलवे से झांकता नहीं
शहजादी, महजबीं, जमीला
किधर गयीं, कुछ पता नहीं

पागल हुआ इशाक, दिखे अब
कहीं न आते जाते

टुकड़े-टुकड़े बिकी जमीनें
औने-पौने ठौर बिके
जीने के आसार रहे जो
चलती बिरियां नहीं दिखे

डब-डब आंखों से देखे
बाजे के टूटे पाते


धज

हीं दिये से फूल झरा
आये न किसी को याद
उड़ा प्रेम कविता का सारा
रंग-रोगन-उन्माद

पानी पी-पीकर
करली है
मुखरा हिचकी बन्द
कोरा भाव धड़कता कैसे
बिना रूप-रस-गंध

भूतमोह सब, झूठमूठ की
छवि का लगा प्रमाद

ज्योतित होकर
जो उभरा है
इस प्रमाद को लांघ
जज्बे का सब उसे
मान बैठा औरांगउटांग

मुक्तिद्वन्द से विकसित धज यह
नहीं ऊंट का पाद.


सम्पर्क-
अबाबील, नीलकंठ, बिहार
आधारकाप, कटनी (म.प्र.)-४८३५०१