गी-ल         राम किशोर दाहिया


सट्‌टा ताश जुआ

मैं हूं जहां पर

लोग खेलते
सट्‌टा ताश जुआ
गईं औरतें मजदूरी पर
भरना पेट कुआं

सिकहर छितिया उल्टे-पल्टे
बुधुआ लीला
टूका रोटी
रतुआ चाटा मांगी खिचरी
सुबक रही
घण्टों से छोटी

परसों का
चूल्हा ठण्डा है
उठता नहीं धुआं

घर में रह दुधमुंहे देखते
उनसे होकर
बड़े खिलौने
अदहन टांगे आग जलाएं
भरके पानी
भरे भगौने

छुप जा सूरज
अम्मा लौटे
उग जा चांद मुआ.


घण्टे लगते एक महीना

नील गगन
तारे जैसा
गिरे देह से टूट पसीना

काम मसाले का बनवाता
घण्टे लगते
एक महीना

श्वास नली
छाती में गीला
हुआ थूक से सूखा चूना

पानी गया
घूंट भर जैसे
खिचरी से भी फदके दूना

फूली नसें
दर्द से दुनपट
लगा हुआ है मरना जीना

दिन भर का
हर्जाना सहकर
मजदूरी से दवा करा दी

बहुत बड़े
दिन का है मालिक
घर में जा कहता परसादी

दो दिन
छोड़ पढाई  बेटे
बदले में कर आ रमदीना.


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