गी-ल             ओम प्रकाश सिंह 

व्यर्थ हुए उपदेश

र्थ नहीं
कहने-सुनने का
व्यर्थ हुए उपदेश

झूठ सजाये
गांव बसा है
घर हैं मालामाल
सच पर
पत्थर गिरते देखे
यह दुनियां का हाल
व्यास गदि्‌दयों पर
संतों का
बदल गया परिवेश

पगडंडी
चुपचाप देखती
फिर सड़कों की चाल
गूंगे की
देहरी पर बैठा
आज भूख का व्याल
सिंहासन से
कौन कहे अब
चलती सांस अशेष

रात उजाली
दिन अंधियारा
समय काटता खेत
पावों के
नीचे हलचल है
खिसक रही है रेत
ढहने लगी
इमारत अपनी
धर खण्डहर का वेश.


धूप पल में छांव

क पल में धूप

पल में छांव
जिन्दगी बहती हुई एक नाव

कुछ हवाएं
छू गईं आकाश को
और कुछ
गूंगी नदी के पाश को
टूटने को टूटते
बदल यहां
किन्तु हुई अंगद के पांव

दो तटों के बीच
रचती है कथा
चल पड़ी है भोगने
अंतर्व्यवस्था
इस लहर से
उस लहर तक छू रही
डोलती सुधि के सुनहरे गांव

रोशनी आई
अंधेरा बांधने
या अंधेरा
रोशनी को लांघने
द्वन्द में बीता सफर
यों जिन्दगी का
हंस रहा जैसे कोई हो घाव.


सम्पर्क-
२५९, शांति निकेतन
साकेत नगर, लालगंज
रायबरेली (उ.प्र.)