गी-ल                 निर्मल शुक्ल

अर्थ बदल दूं काश का

सुबह-सुबह की धूप बना लूं

भर दूं रंग पलाश का

मन हिरना को हंस बना लूं
छू लूं पंख प्रकाश का

सोंधी हल्दी सनी हथेली
कुमकुम की सौगंध
रह रहकर आमंत्रित करती
नेहानुत अनुगंध

मन को पावन नीर बना लूं
तन को हिम कैलाश का

कोई परिचित लहरों जैसा
लेता है आलाप
खोता, उतरता लय धुन में
स्वप्नों में चुपचाप

मन है उसको मेघ बना लूं
अधरों के आकाश का

जी करता है अर्पित कर दूं
कोरों का सब नीर
जैसे सागर के आंगन में
नदिया हारे पीर

मनभावन अनुमान बना लूं
अर्थ बदल दूं काश का

आलाप

बिखरे दाने धूप के

खोल गया
कोई चुपके से
ताने-बाने सूप के

नील निलय से
चली भैरवी
बहकी-बहकी जाये
इन्द्रधनुष  की
गलबहियों में
फूली नहीं समाये

अरुण हो गये
नेह निमन्त्रण
मनुहाने नवरूप के

रेख सुवर्णा
गलियारे में
दे गयी शुभसंवाद
उर्मिल हो गये
मालविकों के
जामुनिया उन्माद

अर्थ बावरी
दिवासावरी
जाने रूप अनूप के

कंचन पीकर
मचले बेसुध
अमलतास के गात
ओस हो गयी
पानी-पानी
जब तक समझे बात

रही बांचती
कुल अभियोजन
अनजाने प्रारूप के

बिखरे दाने धूप के


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