गी-ल                      नचिकेता 

 

 

बीज में क्षुप

दमी

कब तक रहेगा चुप

भूख से
बेचैन जो होंगे
सुर्ख उनके नयन
तो होंगे

घिरा हो
चाहे अंधेरा घुप

जहां पर
होगी उमस निस्तल
हवा में होगी वहीं
हलचल

हर फिजा
दिख रही पद-लोलुप

समय गफलत में
न होगा अब
बदल देगा रंग का
मतलब

बीज में
होता छिपा है क्षुप.



पत्तियों में हलचल

त्तियों में
फिर हुई हलचल
उगेगा शायद
नया जंगल

बची मौसम में
नमी तो है
उमस में
आई कमी तो है
घिरा नभ में है
घना बादल

एक-सा हर
दिन नहीं होता
बदलता हर पक्षी का
खोंता
प्यास ने
ढूंढा हमेशा जल

भूख ने
है रची सारी सृष्टि
बदल दी संवेदना
युगदृष्टि
निहित
अंकुर में रही कोंपल.

सम्पर्क-
प्रेमचन्द प्रसाद
पथ सं०-१, आजाद नगर,
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