गी-ल          मनोज जैन 'मधुर'

नवगीत

लौटकर आने लगे नवगीत

नव कलेवर
नयी भाषा
पुष्टता ले छंद में
लोक अंचल
की विविधता
को संजोकर बंद में
कंठ अब गाने लगे नवगीत

हर कसौटी
पर सदा
उतरे खरे ये स्वर्ण-से
और नागर-बोध
इनमें
झांकता हर वर्ण से
प्राण पर छाने लगे नवगीत

सहज बिम्ब
प्रतीक
धरती से जुड़े हैं ये
लक्ष्य भेदा
लौट आए
जब उड़े हैं ये
मान अब पाने लगे नवगीत



रिश्ते नाते प्रीत के

क-एक कर दृश्य पटल पर
उभरे बिम्ब अतीत के

मां की पीर, पिता की चिंता
उभरी जस की तस
तोड़ रहे दम सपन सलोने
दिन-दिन खाकर गश

नोन तेल लकड़ी में बिसरे
रिश्ते नाते प्रीत के

इच्छाओं की फौज संभाले
फिरा भटकता मन
फिर भी सुख से रहा अछूता
जीवन का दर्शन

मृग तृष्णा से मिले मरुस्थल
मन को अपनी जीत के

लोक रंग को हवा विदेशी
लील रही आकर
धूमिल कबिरा की साखी के
मिले सभी आखर

दिखे सिसकते हमें माढने
और सांथिये भीत के.

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