गी-ल              माहेश्वर तिवारी

मन है
                                                
ज गीत                          
गाने का मन है
अपने को
पाने का मन है


अपनी छाया
है फूलों में
जीना चाह रहा
शूलों में

मौसम पर
छाने का मन है


नदी झील झरनों
सा बहना
चाह रहा
कुछ पल यों रहना

चिड़िया
हो जाने का मन है

 

मुड़ गए जो


मुड़ गए जो रास्ते चुपचाप
जंगल की तरफ
ले गए वे एक जीवित भीड़
दलदल की तरफ

आहटें होने लगीं सब
चीख में तब्दील
हैं टंगी सारे घरों में
दर्द की कन्दील

मुड  गया इतिहास फिर
बीते हुए कल की तरफ

हैं खड़े कुछ लोग इस
अंधे कुएं के पास
रोज जिससे है निकलती
एक फूली लाश

फेंक देते हैं उठाकर
जिसे हलचल की तरफ

 

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