गी-ल               मधुसूदन साहा

हरसिंगार-सा प्यार तुम्हारा

लोकगीत-सी तुम लगती हो
दंतकथा-सा गांव

सतरंगी चूनर पर फबते
बूटे रंग-बिरंग
अंग-अंग से झांक रही है
उठती एक तरंग
शरद चांदनी-सी स्वर्गिक है
पलकों की मृदु छांव

हरसिंगार-सा प्यार तुम्हारा
जूही-सी मुसकान
ये पलाश-से होंठ तुम्हारे
छेड़ें मधुरिम तान
चंपा-सा गदराया यौवन
माने नहीं छिपाव

अंखियों से झर रहा हमेशा
मौलसिरी-सा प्यार
शोख अदाओं पर भूला है
मेरा यह संसार
जाने कब तक तुम बांधोगी
मेरे तट से नाव.


मौसम मनुहार के

लौटे दिन
आज फिर फुहार के

झूले पर
चलो साथ झूलेंगे
बूंदों को
हाथों से छू लेंगे

आये फिर
मौसम मनुहार के

हरियाली
भर लेंगे बांहों में
भटकेंगे
दूर तलक राहों में

बांहों में
बांह को पसार के

पुरवैया
सिहरन भर जाती है
पत्तों से
रह-रह बतियाती है

दिन आये
गलबांही प्यार के.

सम्पर्क-
संकल्प संस्थान, ई/२२२
सेक्टर-२०, राउरकेला
(उड़ीसा)-७६९००५