गी-ल               मधुकर अष्ठाना  

धूमकेतु से प्राण बचाना

धूमकेतु से प्राण बचाना
अब तो कठिन हुआ
उल्काओं में मन बहलाना
अब तो कठिन हुआ

इतने विस्तृत अंतरिक्ष में
धरा बिन्दु सी है
मेरी पीड़ा भी कितनी कम
अगर सिन्धु सी है

नभगंगा में नित्य नहाना
अब तो कठिन हुआ

नक्षत्रों की गहमागहमी
विग्रह का भय है
बनने और बिगडने में
सारा जीवन लय है

नवग्रह का अनुमान लगाना
अब तो कठिन हुआ

बंधे विवशताओं में
जीते तीखी शब्द छुरी
नाच रहे सबके सब साधे
अपनी शूल धुरी

भीगा अंतर आग लगाना
अब तो कठिन हुआ


चाहे जितना दौड़


चाहे जितना दौड़
न फूटी किस्मत जागेगी
बड़े-बड़ों की आन
जिन्दगी तेरी मांगेगी

दौड़ रही है सारी दुनिया
दौड़े संग-सहारे
महानगर के छल से
फिर भी हार गये बेचारे

मुंहताजी में खाक
गरीबी घर से भागेगी

जन्म-जन्म की भूख
पेट से लगा रहा है फेरे
निकल नहीं पाया अब तक
ऐसे फौलादी घेरे

कंचन-मृग-छलना
लेकिन हर दूरी नापेगी

श्रम को अर्पित तेरे चरण
आचरण के साये
भाग रहीं मर्यादायें
दुश्मन दायें-बायें

दौड़ निरन्तर/चादर
बनकर/ममता ढांपेगी.



सम्पर्क-
'विद्यायन', एस० एस० १०८-१०९,
सेक्टर ई, एल० डी० ए० कालोनी,
कानपुर रोड, लखनऊ-२२६०१२
मो.-०९४५०४४७५७९