गी-ल                कैलाश गौतम   

तेज धूप में

तेज धूप में
नंगे पांव
वह भी रेगिस्तान में
मेरे जैसे जाने कितने
हैं इस हिन्दुस्तान में

जोता-बोया-सींचा-पाला
बड़े जतन से देखा भाला
कटी फसल तो
साथ महाजन भी
उतरे खलिहान में

जाने क्या-क्या टूटा-फूटा
हंसी न छूटी गीत न छूटा
सदा रहा
तिरसठ का नाता
बिरहा और मचान में

जीना भी है मरना भी है
मुझको पार उतरना भी है
यही सोचता रहा
बराबर
बैठा कन्यादान में.


उतरे नहीं ताल पर पंछी


तरे नहीं ताल पर पंछी
बादल नहीं घिरे
हम बंजारे
मारे-मारे
दिन-भर आज फिरे

गीत न फूटा
हंसी न लौटी
सब कुछ मौन रहा
पगडंडी पर आगे-आगे
जाने कौन रहा

हवा न डोली
छांह न बोली
ऐसे मोड़ मिले

आर-पार का न्योता देकर
मौसम चला गया
हिरन अभागा उसी रेत में
फिर-फिर छला गया

प्यासे ही रह गये
हमारे
पाटल नहीं खिले

मन दो टूक हुआ है
सपने
चकनाचूर हुए
जितनी दूर नहीं सोचे थे
उतनी दूर हुए

रात गये
आंगन में सौ-सौ
तारे टूट गिरे.


संपर्क-
द्वारा- श्लेष गौतम
१३५-एम.आई.जी.,प्रीतम नगर
इलाहाबाद (उ.प्र.)-०१