गी-ल                  गुलाब सिंह 

हतप्रभ हैं शब्द

शायद किसी मोड़ पर

ठहर जाए
थककर हाँफती
जिन्दगी लौट आए

पीपल के पत्तों तक का
हिलना बन्द है
इस कदर
मौसम निष्पंद है
हवाओं के झोंके
सिर्फ उठें श्मशानों से
भटक रही राख
खुली आँखों में पड़ जाए

मंचों पर नाच रही
कठपुतली
मिट्‌टी खाए मुँह में
डाले टेढ़ी अँगुली
छिः छिः आ आ
माँ बार बार दुहराए
बच्चा बस रो रोकर
मौन मुस्कराए

हतप्रभ हैं शब्द
दया करुणा संवेदना
सब कहते अपने को
दुनिया की आँखों से देखना
कौन सी दुनिया
यही जो मूल्यों के शस्य डाल-
खड़ी है दोनो हाथ
उन पर आए.

गीतों का होना

गीत न होंगे
क्या गाओगे?

हँस-हँस रोते
रो-रो गाते
आँसू-हँसी
राग-ध्वनि-रंजित
हर पल को
संगीत बनाते
लय-विहीन
हो गए अगर
तो कैसे फिर
सम पर आओगे

तन में कण्ठ
कण्ठ में स्वर है
स्वर शब्दों की
तरल धार ले
देह नदी
हर साँस लहर है
धारा को अनुकूल
किए बिन
दिशाहीन बहते जाओगे

स्वर अनुभावन
भाव विभावन
ऋतु वैभव
विन्यास पाठ विधि
रचनाओं के
फागुन-सावन
मुक्त-प्रबंध
काव्य कौद्गाल से
धवल नवल
रचते जाओगे.



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