गी-ल                   दिनेश सिंह

आ गए पंछी

गए पंछी
नदी को पार कर
इधर की रंगीनियों से प्यार कर

उधर का सपना
उधर ही छोड़ आए
हमेशा के वास्ते
मुंह मोड़ आए

रास्तों को
हर तरह तैयार कर

इस किनारे
पंख अपने धो लिये
नये सपने
उड़ानों में बो लिये

नये पहने
फटे वस्त्र उतारकर

नाम बस्ती के
खुला मैदान है
जंगलों का
एक नखलिस्तान है

नाचते सब
अंग-अंग उघार कर

हमः देहरी-दरवाजे!

राजपाट छोड़कर गए
राजे-महराजे
हम उनके कर्ज पर टिके
देहरी दरवाजे

चौपड़ ना बिछी पलंग पर
मेज पर बिछी
पैरों पर चांदनी बिछीः
सेज पर बिछी

गुहराते रोज ही रहे
धर्म के तकाजे

अपने-अपने हैं कानून
मुक्त है प्रजा
सड़ी-गली लाठी को है
भैंस ही सजा

न्यायालयः सूनी कुर्सी
क्या चढी बिराजे!

चमकदार आंखें निरखें
गूलर का फूल
जो नही खिला अभी-अभी
किसी वन-बबूल

अंतरिक्ष में कहीं हुआ
तारों में छाजे

सम्पर्क-
ग्रा.-गौरारुपई
पो.-लालूमऊ
जनपद-रायबरेली (उ.प्र.)-२२९३०९