गी-ल                बुद्धिनाथ मिश्र 

स्तब्ध है कोयल

स्तब्ध हैं कोयल कि उनके स्वर
जन्मना कलरव नहीं होंगे
वक्त अपना या पराया हो
शब्द ये उत्सव नहीं होंगे

गले लिपटा अधमरा यह सांप
नाम जिस पर है लिखा गणतंत्र
ढो सकेगा कब तलक यह देश
जबकि  सब हैं सर्वतंत्र स्वतंत्र

इस अवध के भाग्य में राजा
अब कभी राघव नहीं होंगे

यह महाभारत अजब-सा है
कौरवों से लड़ रहे कौरव
द्रोपदी की खुली वेणी की
छांह में छिप सो रहे पांडव

ब्रज वही है, द्वारका भी है
किंतु अब केशव नहीं होंगे

जीतकर हारा हुआ यह देश
मांगता ले हाथ तंबूरा
सुनो जनमेजय, तुम्हारा यज्ञ
नाग का शायद न हो पूरा

कोख में फिर धरा-पुत्री के
क्या कभी कुश-लव नहीं होंगे?


आर्द्रा

र की मकड़ी कोने दुबकी
वर्षा होगी क्या?
बायीं आंख दिशा की फड़की
वर्षा होगी क्या?

सुन्नर बाभिन बंजर जोते
इन्नर राजा हो!
आंगन-आंगन छौना लोटे
इन्नर राजा हो!
कितनी बार भगत गुहराए
देवी का चौरा?
भरी जवानी जरई सूखे
इन्नर राजा हो?

आगे नहीं खिसकता सूरज के
रथ का पहिया
भुइंलोटन पुरवैया सिहकी
वर्षा होगी क्या?

छाती फटी कुआं-पोखर की
धरती पड़ी दरार
एक पपीहा तीतरपाखी घन को
रहा पुकार
चील उड़े डैने फैलाए
जलते अंबर में
सहमे-सहमे बाग-बगीचे
सहमे-से घर-द्वार

लाज तुम्हीं रखना पियरी की
हे गंगा मइया!
रेत नहा गौरैया चहकी
वर्षा होगी क्या!

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