गी-ल                   अनूप अशेष 

अब भी बाकी है

ब तो यह मत कहो
कि तुममें रीढ़ नहीं है
तुममें जिन्दा
अब भी
पतली मेड़

गई जोत में
फिर भी आधी अब भी बाकी है
ढेलों में सांसों की खातिर
घर की चाकी है

एहसासों के हर किवाड़ को
रखना
मन में भेड़

सुलगा कर
कोनों में रखना देहों की तापें
खुद से दूर न होंगी
अपनी पुश्तैनी
नापें

बिस्वे होंगे बीघे होंगे
खेती
अपनी छेड़


इस अरण्य में पैदल


झाड़ी पकती झरबेरी
पत्थर फूटे झरने
दिन आए है
पैदल चलकर
बीहड़ घाट उतरने

पके बांस की रगड़
घास में आग फूटती है
बूढ़ी लकड़हारनी
भूखे-हाथ कूटती है

ऐसी नई व्यवस्था
जंगल
कौन जाए चरने

बाघ शेर तेंदुए बस्ती में
इस अरण्य में हम
चले कौन आंखों के रस्ते
खुले रास्ते कम

कोल भील के पांव
कहां जाएं
पेटों को धरने


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